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शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्‌।दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्‌॥ भावार्थ : शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव- ये सब-के-सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं ॥43॥ Heroism, power, determination, resourcefulness, courage in battle, genero...

Bhagavad Gita : अध्याय 18 का श्लोक 43

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03/21/2017 at 07:01. Facebook
…At the time of death, Ajamila helplessly and very loudly chanted the holy name of the Lord. That chanting alone has already freed him from the reactions of all sinful life. One who chants the holy name is immediately freed from the reactions of unlimited sins, even if he chants indirectly to indica...

The Deliverance of Ajamila 03 APR 2013 by The Hare Krishna Movement in A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada, Ajamila, Back to Godhead, Srimad Bhagavatam Tags: A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada, Back to Godhead Magazine, Hare Krishna, Narayana,

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03/21/2017 at 04:34. Facebook
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्‌ ॥ भावार्थ : अंतःकरण का निग्रह करना, इंद्रियों का दमन करना, धर्मपालन के लिए कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध (गीता अध्याय 13 श्लोक 7 की टिप्पणी में देखना चाहिए) रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इंद्रिय और शरीर…

Bhagavad Gita : अध्याय 18 का श्लोक 42

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Poorn Samarpan
03/20/2017 at 05:58. Facebook
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥ भावार्थ : हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किए गए हैं ॥41॥ Brāhmaṇas, kṣatriyas, vaiśyas and śūdras are distinguished by their qualities of work, O c...

Bhagavad Gita : अध्याय 18 का श्लोक 41

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03/17/2017 at 07:40. Facebook
Beyond Saṁsāra As I was reading from the Srimad Bhagavatam this morning about the passing of Bhīṣmadeva it was being described how “The perfect yogīs or mystics can leave the material body at their own sweet will at a suitable time and go to a suitable planet desired by them.” And how it is possiabl...

Beyond Samsara

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03/17/2017 at 07:13. Facebook
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिःस्यात्त्रिभिर्गुणैः॥ भावार्थ : पृथ्वी में या आकाश में अथवा देवताओं में तथा इनके सिवा और कहीं भी ऐसा कोई भी सत्त्व नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से रहित हो ॥40॥ There is no being existing, either here or among...

Bhagavad Gita : अध्याय 18 का श्लोक 40

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03/16/2017 at 13:16. Facebook
रोनाल्ड निक्सन का पूरा नाम रोनाल्ड हेनरी निक्सन था। ये अंग्रेज थे लेकिन आज लोग इन्हें “कृष्ण प्रेम” के नाम से जानते हैं। ये इंग्लैंड से थे। 18 वर्ष की उम्र में प्रथम जर्मन युद्ध में श्री रोनाल्ड निक्सन ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। वे उस युद्ध में हवाई बेड़े में एक ऊँचे अफसर थे। युद्ध का उन्माद उतर जाने...

बांके बिहारी के चमत्कार कहानी | Poornsamarpan.in

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03/16/2017 at 13:12. Facebook
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्‌॥ भावार्थ : जो सुख भोगकाल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा गया है ॥39॥ And that happiness which is blind to self-realization, which is delusion from begin...

Bhagavad Gita : अध्याय 18 का श्लोक 39

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संत हर‌िदास जी से म‌िलने एक व्यक्त‌ि आए। यह अपने साथ महंगा इत्र लेकर आए थे। जब यह हर‌िदास जी के पास पहुंचे तब वह ध्यान मग्न थे। इन्होंने इत्र की शीशी हर‌िदास जी के पास रख दी। ह‌र‌िदास जी ध्यान मुद्रा में बांके ब‌िहारी के साथ देवी राधा की होली देखने में मग्न थे। हर‌िदास जी ने देखा क‌ि बांके ब‌िहारी न...

रेत पर ग‌िरा इत्र नहा गए ब‌िहारी जी

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विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्‌।परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्‌॥ भावार्थ : जो सुख विषय और इंद्रियों के संयोग से होता है, वह पहले- भोगकाल में अमृत के तुल्य प्रतीत होने पर भी परिणाम में विष के तुल्य (बल, वीर्य, बुद्धि, धन, उत्साह और परलोक का नाश होने से विषय और इंद्रियों के संयोग से होने...

Bhagavad Gita : अध्याय 18 का श्लोक 38

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सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ।अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्‌।तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्‌॥

Bhagavad Gita : अध्याय 18 का श्लोक 36-37 | Poornsamarpan.in

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यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥ भावार्थ : हे पार्थ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा निद्रा, भय, चिंता और दु:ख को तथा उन्मत्तता को भी नहीं छोड़ता अर्थात धारण किए रहता है- वह धारण शक्ति तामसी है ॥35॥ And that determination which cannot go...

Bhagavad Gita : अध्याय 18 का श्लोक 35

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यया तु धर्मकामार्थान्धत्या धारयतेऽर्जुन।प्रसङ्‍गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥ भावार्थ : परंतु हे पृथापुत्र अर्जुन! फल की इच्छावाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा अत्यंत आसक्ति से धर्म, अर्थ और कामों को धारण करता है, वह धारण शक्ति राजसी है ॥34॥ And that determination by which one holds fast t...

Bhagavad Gita : अध्याय 18 का श्लोक 34

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श्रीभगवान-उवाच ----------------------- गीत्वा तु मम नामानि विचरेन्मम संनिधौ । इति ब्रवीमि ते सत्यं क्रीतोऽहम् तस्य चाऽर्जुन ।। ----(आदि पुराण)---- हे अर्जुन ! मैं तुझसे सत्य कहता हूॅ कि जो सदा सर्वत्र मुझे अपने साथ अनुभव करते हुऐ मेरे नामो का गायन/जाप/संकीर्तन करता हुआ विचरता हैं, उसने मुझे खरीद ही…

श्रीभगवान-उवाच | Poornsamarpan.in

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धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ भावार्थ : हे पार्थ! जिस अव्यभिचारिणी धारण शक्ति (भगवद्विषय के सिवाय अन्य सांसारिक विषयों को धारण करना ही व्यभिचार दोष है, उस दोष से जो रहित है वह 'अव्यभिचारिणी धारणा' है।) से मनुष्य ध्यान योग के द्वारा मन, प्रा...

Bhagavad Gita : अध्याय 18 का श्लोक 33

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गोकुल में एक मोर रहता था. वह रोज़ भगवान कृष्ण भगवान के दरवाजे पर बैठकर एक भजन गाता था- “मेरा कोई ना सहारा बिना तेरे, गोपाल सांवरिया मेरे, माँ बाप सांवरिया मेरे”. :diamonds:रोज आते-जाते भगवान के कानों में उसका भजन तो पड़ता था लेकिन कोई खास ध्यान न देते. मोर भगवान के विशेष स्नेह की आस में रोज भजन गाता…

Jai Jai Shri Radhe.... | Poornsamarpan.in

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गोकुल में एक मोर रहता था. वह रोज़ भगवान कृष्ण भगवान के दरवाजे पर बैठकर एक भजन गाता था- “मेरा कोई ना सहारा बिना तेरे, गोपाल सांवरिया मेरे, माँ बाप सांवरिया मेरे”. :diamonds:रोज आते-जाते भगवान के कानों में उसका भजन तो पड़ता था लेकिन कोई खास ध्यान न देते. मोर भगवान के विशेष स्नेह की आस में रोज भजन गाता…

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अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥ भावार्थ : हे अर्जुन! जो तमोगुण से घिरी हुई बुद्धि अधर्म को भी 'यह धर्म है' ऐसा मान लेती है तथा इसी प्रकार अन्य संपूर्ण पदार्थों को भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है ॥32॥ That understanding which considers irr...

Bhagavad Gita : अध्याय 18 का श्लोक 32

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