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Poorn Samarpan
12/09/2016 at 06:12. Facebook
Who is Shree Krishna? What is the nature of His birth? Why should we be concerned with His Birth? Who is Shree Krishna? What is the nature of His birth? Why should we be concerned with His Birth? To get the answers, we shall approach the Vedas for they are the greatest authority. भूतं भव्यं भव...

Who is Shree Krishna? What is the nature of His birth? Why should we be concerned with His Birth? | Poornsamarpan.in

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Poorn Samarpan
12/09/2016 at 05:32. Facebook
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः।तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥ भावार्थ : अर्जुन बोले- हे कृष्ण! जो मनुष्य शास्त्र विधि को त्यागकर श्रद्धा से युक्त हुए देवादिका पूजन करते हैं, उनकी स्थिति फिर कौन-सी है? सात्त्विकी है अथवा राजसी किंवा तामसी? ॥1॥ Arjuna said, O Kṛṣṇa, what…

Bhagavad Gita : अध्याय 17 का श्लोक 1

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Poorn Samarpan
yesterday at 11:30. Facebook
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥ भावार्थ : इससे तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने योग्य है ॥24॥ One should understand what is duty and what is not duty b...

Bhagavad Gita : अध्याय 16 का श्लोक 24

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yesterday at 11:19. Facebook
Poorn Samarpan
12/07/2016 at 06:16. Facebook
Hare Krishna....
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12/07/2016 at 06:06. Facebook
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्‌॥ भावार्थ : जो पुरुष शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही ॥23॥ But he who discards scriptural injunctions and acts according to his own whi...

Bhagavad Gita : अध्याय 16 का श्लोक 23 | Poornsamarpan.in

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Poorn Samarpan
12/07/2016 at 05:54. Facebook
The Goal of Human Life! It is a fact that every individual performs actions with a specific aim. No one can remain inactive even for a moment and no action is performed without a purpose. The Darśhan Śhāstra declares- prayojanamanuddiśhya mando̓pi na pravartate

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12/05/2016 at 06:41. Facebook
हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे। हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे ॥

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12/05/2016 at 06:36. Facebook
The Pillars of Devotion! There are 8.4 million species on the earth planet. Amongst them, the human form of life is the only one where spiritual practice is made possible to get rid of all sorrows and attain eternal happiness. This human life is so rare that even celestial Gods long for it. This h...

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12/05/2016 at 06:18. Facebook
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्‌॥ भावार्थ : हे अर्जुन! इन तीनों नरक के द्वारों से मुक्त पुरुष अपने कल्याण का आचरण करता है (अपने उद्धार के लिए भगवदाज्ञानुसार बरतना ही 'अपने कल्याण का आचरण करना' है), इससे वह परमगति को जाता है अर्थात्‌ मुझको प्राप्त…

Bhagavad Gita : अध्याय 16 का श्लोक 22

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12/03/2016 at 12:28. Facebook
O Shree Krishna listen to my humble cry! कब मिलिहौ नंद कुमार, तुम मातु पिता भरतार । यह कह तेरी श्रुति चार, अब सुन लो मोर पुकार ॥ तव अगनित जन सरकार, हमरे इक तुम आधार । दुख पाये विविध प्रकार, अब सुन लो मोर पुकार ॥ लख चौरासी तनु धार, जनमेउ जग बारंबार । रह देखत तुम सरकार, अब सुन लो मोर पुकार ॥

O Shree Krishna listen to my humble cry!

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Poorn Samarpan
12/03/2016 at 12:20. Facebook
Hare Krishna....
Poorn Samarpan
12/03/2016 at 12:14. Facebook
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्‌॥ भावार्थ : काम, क्रोध तथा लोभ- ये तीन प्रकार के नरक के द्वार ( सर्व अनर्थों के मूल और नरक की प्राप्ति में हेतु होने से यहाँ काम, क्रोध और लोभ को 'नरक के द्वार' कहा है) आत्मा का नाश करने वाले अर्थात्‌ उसको अधोगति में…

Bhagavad Gita : अध्याय 16 का श्लोक 21

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12/02/2016 at 09:21. Facebook
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12/02/2016 at 07:53. Facebook
My hypocrisy equals that of millions of Kalnemis and in pride I equal countless Ravans! दीनानाथ मोिहं काहे बिसारे । हमरििहं बार मौन कस धारे । O Lord of destitute! Why have You forsaken me? When it came my time to receive grace, why have You suddenly become silent? नाथ ! अगति के गति अनाथ हम, कहहु...

My hypocrisy equals that of millions of Kalnemis and in pride I equal countless Ravans!

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12/02/2016 at 07:38. Facebook
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्‌॥ भावार्थ : हे अर्जुन! वे मूढ़ मुझको न प्राप्त होकर ही जन्म-जन्म में आसुरी योनि को प्राप्त होते हैं, फिर उससे भी अति नीच गति को ही प्राप्त होते हैं अर्थात्‌ घोर नरकों में पड़ते हैं ॥20॥ Attaining repeated birth amongst…

Bhagavad Gita : अध्याय 16 का श्लोक 20

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जय गुरुजी अमृत वाणी हर हर तेरी सुण सुण होवे परम् गत् मेरी जलन बुझी शीतल हुए मनवा सद्गुरू का दशॅन पाए जीओ... परम वंदनीय प्रातः स्मरणीय परम पूजनीय श्री गुरुजी जी के चरणो में कोटि कोटि प्रणाम गुरु जी की प्यारी प्यारी संगत जी को जय गुरुजी

Jai Jai Guruji | Poornsamarpan.in

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तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्‌।क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥ भावार्थ : उन द्वेष करने वाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बार-बार आसुरी योनियों में ही डालता हूँ ॥19॥ Those who are envious and mischievous, who are the lowest among men, are cast by Me into the ocean o...

Bhagavad Gita : अध्याय 16 का श्लोक 19 | Poornsamarpan.in

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Sunday, November 27, 2011Surrender-The True Means of Conquering the Mind Surrender-The True Means of Conquering the Mind

Surrender-The True Means of Conquering the Mind

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